आज मैने सीढ़ियों पर उल्टा उतरना सीखा
सोचती थी की भगवान ने दोनों आँखें चेहेरे के सामने ही क्यूँ दी है ?
एक आँख आगे और एक पीछे होती तो ?
तो दोनों आँखों का आकर भी बड़ा होता ?
उल्टा उतरने में मुश्किल तो नहीं हुवी
पर हां ! आँखें बंद कर के उतरना आसान था !
आँखें बंद करने पर ये विश्वास था
की अगर गिरी तो फिर खड़ी हो जाऊंगी
आँखें खोल कर शायद कदम फूँक फूँक कर रखती हूँ
और अगर ग़लती से ठोकर लग गयी
तो संभलने का साहस नहीं होता
तो क्या आँखें होती ही नहीं तो क्या होता ?
गिरती उठती, फिर गिरती फिर उठती
पर शायद हर वक़्त इस डर के साथ नहीं जीती की कदम सही पड़ने चाहिए !
क्या ये सच है ? सोचती हूँ किसी बिना आँखें वाले से पूचों
उसे ये सब अच्छा लगेगा क्या ?
और फिर वोही ख़याल
शायद दोनों आँखें चेहरे के सामने नहीं होती तो अच्छा होता !
पर आगे कुछ और दिखता , पिच्छे कुछ और
तो डरऔर बढ़ जाता, क्यूंकी अब दोनों तरफ कदम फूँक के रखने पड़ते !
सोचती हूँ.. एक बार गिर कर देखती हूँ ! आख़िर पीछे तो आँखें है नहीं ना !
सोचती थी की भगवान ने दोनों आँखें चेहेरे के सामने ही क्यूँ दी है ?
एक आँख आगे और एक पीछे होती तो ?
तो दोनों आँखों का आकर भी बड़ा होता ?
उल्टा उतरने में मुश्किल तो नहीं हुवी
पर हां ! आँखें बंद कर के उतरना आसान था !
आँखें बंद करने पर ये विश्वास था
की अगर गिरी तो फिर खड़ी हो जाऊंगी
आँखें खोल कर शायद कदम फूँक फूँक कर रखती हूँ
और अगर ग़लती से ठोकर लग गयी
तो संभलने का साहस नहीं होता
तो क्या आँखें होती ही नहीं तो क्या होता ?
गिरती उठती, फिर गिरती फिर उठती
पर शायद हर वक़्त इस डर के साथ नहीं जीती की कदम सही पड़ने चाहिए !
क्या ये सच है ? सोचती हूँ किसी बिना आँखें वाले से पूचों
उसे ये सब अच्छा लगेगा क्या ?
और फिर वोही ख़याल
शायद दोनों आँखें चेहरे के सामने नहीं होती तो अच्छा होता !
पर आगे कुछ और दिखता , पिच्छे कुछ और
तो डरऔर बढ़ जाता, क्यूंकी अब दोनों तरफ कदम फूँक के रखने पड़ते !
सोचती हूँ.. एक बार गिर कर देखती हूँ ! आख़िर पीछे तो आँखें है नहीं ना !