Sunday, February 1, 2026

बेटी का घर

 


बेटियों के घर नहीं होते  
 
घर होते हैं 
ईटों के  
बोझ के  
जब बेटी पैदा  
होती हैं  
 
घर होते हैं  
उस बेटे के  
जिसे लड़की पैदा करेगी 
और के लिए  
 
उसका खुद का कोना 
भी नहीं होता  
वो ढूनडटी है घर  
जहाँ सुकून से खुद की  
जगह बनाए  
जहाँ वो  
बेटी और बहू से परे  
इंसान हो  
अपनी इक्चाओ के साथ 
जहाँ भाभी के घर जाने  
की अनुभूति ना हो  
ना इजाज़त लेनी हो  
 
जहाँ लड़का पैदा करने  
से उसका वजूद ना हो  
पुत्रवती होने से पहले  
खुश रहने का आशीर्वाद मिले  
 
और जहाँ उसकी आवाज़  
उसका गुरु नहीं 
अधिकार हो  
 
बेटियों को घर बनाना चाहिए 
 
एक खुद का  
सुकून का, अधिकार का  
जहाँ वो बेटी, बहन, ननद या बहू ना हो 
बस एक इंसान हो  
 
श्वेता सिंघ  
फेब्रुवरी , २०२६ 
 

Friday, October 3, 2025

पेड़ का तना

 

एक बूढ़ा तना 
भूरा बदसूरत  
अकेला 
अनेको क्षति  
 
गहरी जड़ें  
घनी टहनियाँ  
पक्षियों का घर  
मिट्टी का बाँध  
 
कभी हरा था  
कमजोर 
खड़ा रहा  
हवा की ठोकर में  
पत्तों को उठाए 
धूप में तप कर  
और हो गया  
 
बदसूरत सख़्त  
चोट खाने को सहज़  
यदपि अभी भी  
गहरी जड़ें  
घनी टहनियाँ 
हैं निर्भर  
बूढ़े तने पर  
 
श्वेता सिंघ 
3rd Oct 2025
10:02 PM
 

Saturday, October 5, 2024

Earthworms

There are somethings,
Scared,
that sits with her,
in solitary evenings
It doesn’t want a voice
neither to see
all it wants for a moment,
to just be
it’s the tears she shed
on a rose bed
hurting an earthworm
when she took, the digging turn
Will I cut again
and bear the pain ?
of guilts to live with
no chance to explain ?
What can voice do
if they don’t hear
it’s better
that she doesn’t go near
So, she sits there
to just be
in a solitary evening
of memory
- Shweta
(Oct 5th, 2024)

Wednesday, November 24, 2021

कठोर कछुवा

 एक कछुवा,
चला गर्दन निकाल,
देख निकट एक ताल |
हरियाली उसे भाई ||
पर, ये क्या,
एक मनुस्य की जाती आई !

देख कछुवे को वो हुवे अभिभूत,
उठा पत्थर चले देने उसे कूट,

कछुवा घबराया,
गर्दन उठाया,
ये दानव कहाँ से आया ?

मन ही मन सोचा, 
भागू तो मर सकता हूँ,
रुका तो कुचला जा सकता हूँ,
मन में उठी आधी,
उसने लड़ने की ठानी ||

पर कैसे, ?
मैं तो नन्हा हूँ    |
इतने में भीतर से आवाज़ आई,
चल मैदान में पत्थर बन जा भाई || 

ये दानव तेरे कोमल अंग और मन 
पर करेगा प्रहार
पत्थर हो जाएगा, तो नहीं करेगा वार 

बस, कछुवे ने अपने सुकोमल मन और अंग 
को छुपाया, 
और तुरंत एक पत्थर बन कर दिखाया 

भीतर बैठा, डरा भयभीत
कहीं अभी भी ये दे ना मुझे पीट

सुकोमल से मन में भय और आशा थी
शायद यही, कछुवे की कठोरता की परिभासा थी

उप्पर से जब दिखा पत्थर, कछुवा निर्जीव
उस मानव ने, फिर भी एक ढेला मारा खीच

वर्सों से बने उस कठोर छाल को
आई ना तनिक चोट,
कछुवा मुस्काया, 
बस यही मेरी जंग की जीत है
जो कोमल है, वो नहीं दिखता,
जिस पर आघात हो, वो निर्जीव है  || 

श्वेता सिंघ 
२३ नवेंबर २०२१ 
कछुवा घबराया,

Saturday, June 6, 2020

Uprisings


Off late,
Silence is not an option,
But, Words
they are not enough too !
I stare with stunned emotions,
To erase,
What I want to be untrue.
Yet, I can't, No-one could.


And between silence and incapable words,
I stand holding a hope,
That silence will be broken
Not by Words, that won't be enough
Roads will be taken
And lights will glow
Many will walk or sit,
For What matters,
Slowly, gradually and perhaps
In a flash, will bend knees to claim
Black Lives Matter
And show to World,
It always has and it always will !

-Shweta Singh

Sunday, May 3, 2020

कोरोना डाईरिेज़

क़ब्रे मिसाल दूं क्या तुझे,
जिंदगी तेरी मंज़िल वही |
आज तेरे सामने हूँ झोली फैलाए
कल मौत करेगी मालामाल मुझे ||

श्वेता सिंघ

Monday, November 4, 2019

स्वपनों का भार


घर दरबार छोड़ आए हम,
पर्व त्योहार  भी हो गये गुम
किन स्वपनों में जाग रहे हैं
नींद सुकून की गयी जहन्नुम

कोलाहाल सा मचा है,
खाली से इन भवनों में
शुन्य की आँधी, लहर रही है
थर थर अधरोन के स्वरों से

किर्किट की कुछ आवाज़ें
गीत सुनाती उठती हैं
चीख चीख कर, थक हर कर
सन्न्नतों में सिमटी हैं

आधा चंद्रमा भी , झाँक रहा है
दोहरी से खड़ा , असमंजस में,
आने का कोई कारण ना है
अमावस्या के  आँगन में

खड़ा खड़ा जब थक जाता है
सनाटों के चौखट पर
चंदा भी फिर, सो जाता है
कुण्डी पकड़े, रैन बिता कर

धीरे धीरे फिर, तीव्र सवेरा
धो देता है आँगन को
मरे हुवे किर्किट फेक कर,
चल देते, उठा स्वपनों को

कोल्हाल शांत हुवा फिर,
आधारों पर है मुस्कानें
घर बार की सुध भी नहीं है,
नींद अभी भी है जहन्नुम

- श्वेता सिंघ