बेटियों के घर नहीं होते
घर होते हैं
ईटों के
बोझ के
जब बेटी पैदा
होती हैं
घर होते हैं
उस बेटे के
जिसे लड़की पैदा करेगी
और के लिए
उसका खुद का कोना
भी नहीं होता
वो ढूनडटी है घर
जहाँ सुकून से खुद की
जगह बनाए
जहाँ वो
बेटी और बहू से परे
इंसान हो
अपनी इक्चाओ के साथ
जहाँ भाभी के घर जाने
की अनुभूति ना हो
ना इजाज़त लेनी हो
जहाँ लड़का पैदा करने
से उसका वजूद ना हो
पुत्रवती होने से पहले
खुश रहने का आशीर्वाद मिले
और जहाँ उसकी आवाज़
उसका गुरुर नहीं
अधिकार हो
बेटियों को घर बनाना चाहिए
एक खुद का
सुकून का, अधिकार का
जहाँ वो बेटी, बहन, ननद या बहू ना हो
बस एक इंसान हो
श्वेता सिंघ
फेब्रुवरी १, २०२६