Wednesday, November 24, 2021

कठोर कछुवा

 एक कछुवा,
चला गर्दन निकाल,
देख निकट एक ताल |
हरियाली उसे भाई ||
पर, ये क्या,
एक मनुस्य की जाती आई !

देख कछुवे को वो हुवे अभिभूत,
उठा पत्थर चले देने उसे कूट,

कछुवा घबराया,
गर्दन उठाया,
ये दानव कहाँ से आया ?

मन ही मन सोचा, 
भागू तो मर सकता हूँ,
रुका तो कुचला जा सकता हूँ,
मन में उठी आधी,
उसने लड़ने की ठानी ||

पर कैसे, ?
मैं तो नन्हा हूँ    |
इतने में भीतर से आवाज़ आई,
चल मैदान में पत्थर बन जा भाई || 

ये दानव तेरे कोमल अंग और मन 
पर करेगा प्रहार
पत्थर हो जाएगा, तो नहीं करेगा वार 

बस, कछुवे ने अपने सुकोमल मन और अंग 
को छुपाया, 
और तुरंत एक पत्थर बन कर दिखाया 

भीतर बैठा, डरा भयभीत
कहीं अभी भी ये दे ना मुझे पीट

सुकोमल से मन में भय और आशा थी
शायद यही, कछुवे की कठोरता की परिभासा थी

उप्पर से जब दिखा पत्थर, कछुवा निर्जीव
उस मानव ने, फिर भी एक ढेला मारा खीच

वर्सों से बने उस कठोर छाल को
आई ना तनिक चोट,
कछुवा मुस्काया, 
बस यही मेरी जंग की जीत है
जो कोमल है, वो नहीं दिखता,
जिस पर आघात हो, वो निर्जीव है  || 

श्वेता सिंघ 
२३ नवेंबर २०२१ 
कछुवा घबराया,

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