जहाँ कुछ भी नहीं
उस जगह पर गली की धूल हो शायद
उस एक दोपहर का ख़ालीपन
जो आहट जाने के बाद आता है !
बचपन के आगे
पर आज के पीछे
उस वक़्त में भी
जहाँ बड़े कदम बढ़े आते थे उसकी ओर
उन कदमों में प्यार था !
कुछ एक की आँखें जो !
उसके जाने के बाद
उसकी रूह को देखती थी
कभी जो मुड़ कर देखा उसने
तो टिकी थी वहीं
पर, रुकना ?
क्या सोच कर चलना ?
एक तस्वीर हाथ में थामे
किसी कलाकार की कृति थी
टूटे वृक्ष की कोह्ह में
जो बिना जड़ के
एक दीवार में क़ैद है,
वो तस्वीर वोहीं है
एक वादा कर दिया था
अपनी एक कविता
सबसे छुपा कर रखी है
वही तस्वीर के लिए गिरवी रखना है!
बड़े दिनों तक ताबूत में बंद था, जीवित
शायद, कलाकार ने ढूँढा होगा ?
मृता था ? नहीं तो..
ताबूत में क्यूँ नहीं ढूँढा ?
बड़ा भटका होगा शायद
चूल्हे में, कढ़ाई में, या की हंडी में..
कलाकार था, शायद ऐसी ही जगहों पर ढूँढा होगा
और दूर जाना, प्रयास करना ?
पर मृत हूँ, ये प्रेम नहीं स्वीकारता.
ताबूत अन्छुव रह गया..
अब, बाँस के बगीचे भी बन गये हैं !
कलाकार बैठ गया है !!
शांत और सुखी. ढूंदना ज़रूरी नहीं
ताबूत भी टूट गया है
जीवित निकल आई है स्मृति
पर अब ?
वो गली खाली है
कदम और आहट ?
गिरवी रखी कविता, मुक्त है, दावेदार नहीं
तस्वीर का चाँद, और वो बगुला, बूढ़े हो गये.
कलाकार की स्मृति में वो तस्वीर भी नहीं, क्यूँ हो ?
जो ताबूत में कवि था, वो जीवित है.
गिरवी रखी कविता बाँट डाली.
तस्वीर उसी शाख पर रखी है.
कलाकार आएगा, तो नयी कविता से वो तस्वीर खरीदी जाएगी
पर अभी
कवि, कलाकार और तस्वीर
सब पॅसॅड यूगा के चरित्रा हैं. !
और ये जो लिखा है..
वो कवि है, जिसको गिरवी रखा कुछ याद नहीं, ना कुछ संवेदना है.!!
तस्वीर, ढूँढली हो रही है अब..कलाकार गुम. !
श्वेता सिंघ
