Thursday, November 22, 2012

कवि और कलाकार



जहाँ कुछ  भी नहीं
उस जगह पर गली की धूल हो शायद
उस एक दोपहर का ख़ालीपन
जो आहट जाने के बाद आता है !

बचपन के आगे
पर आज के पीछे
उस वक़्त में भी
जहाँ बड़े कदम बढ़े आते थे उसकी ओर
उन कदमों में प्यार था !

कुछ एक की आँखें जो !
उसके जाने के बाद
उसकी रूह को देखती थी
कभी जो मुड़ कर देखा उसने
तो टिकी थी वहीं

पर, रुकना ?
क्या सोच कर चलना ?
एक तस्वीर हाथ में थामे
किसी कलाकार की कृति थी

टूटे वृक्ष की कोह्ह में
जो बिना जड़ के
एक दीवार में क़ैद है,
वो तस्वीर वोहीं है

एक वादा कर दिया था
अपनी एक कविता
सबसे छुपा कर रखी है
वही तस्वीर के लिए गिरवी रखना है!

बड़े दिनों तक ताबूत में बंद था, जीवित
शायद, कलाकार ने ढूँढा होगा ?
मृता था ? नहीं तो..
ताबूत में क्यूँ नहीं ढूँढा ?

बड़ा भटका होगा शायद
चूल्‍हे में, कढ़ाई में, या की हंडी में..
कलाकार था, शायद ऐसी ही जगहों पर ढूँढा होगा
और दूर जाना, प्रयास करना ?
पर मृत हूँ, ये प्रेम नहीं स्वीकारता.
ताबूत अन्छुव रह गया..

अब, बाँस के बगीचे भी बन गये हैं !
कलाकार बैठ गया है !!
शांत और सुखी. ढूंदना ज़रूरी नहीं
ताबूत भी टूट  गया है
जीवित निकल आई है स्मृति

पर अब ?
वो गली खाली है
कदम और आहट ?
गिरवी रखी कविता, मुक्त है, दावेदार नहीं
तस्वीर का चाँद, और वो बगुला, बूढ़े हो गये.
कलाकार की स्मृति में वो तस्वीर भी नहीं, क्यूँ हो ?
जो ताबूत में  कवि था, वो जीवित है.
गिरवी रखी कविता बाँट डाली.
तस्वीर उसी शाख पर रखी है.

कलाकार आएगा, तो नयी कविता से वो तस्वीर खरीदी जाएगी
पर अभी
कवि, कलाकार और तस्वीर
सब पॅसॅड यूगा के चरित्रा हैं. !
और ये जो लिखा है..
वो कवि है, जिसको गिरवी रखा कुछ याद नहीं, ना कुछ संवेदना है.!!
तस्वीर, ढूँढली हो रही है अब..कलाकार गुम. !

श्वेता सिंघ

Wednesday, October 31, 2012

Movement's Musings

As She hold her out
In a stretch of arm
Like the new sprout
A story of love form

She looks over the light
Her face shy and bright
Is hidden in sunset
Awaiting for someone, I bet

On her toe, behind her back
holding with hand one of the rack
That's the ballet dance
with twist of love's trance



Elegance of purity
Evening serenity
Alone there she was
Swinging in ecstasy, without a pause 

Colors made her still
Stop her dance, they will ?
Can't touch the glow of her face
Can't hear the beat of heart's race !

Painters and Dancers, step they choose
One still and one swinging move
Stillness also has a dance,
Watch it over if you have a chance
She stands there with a story untold
And if its alive her movements unfold

But the painter has captured her in a frame
I wish, the painter and dancer knew each other's name !
The Ballet would be complete then
She must be waiting, when ?
Shy she is and painter is keen
Love is surely flourishing as seen :)


- Shweta Singh

PS : This painting is by Eduardo Argüelles. As I saw the painting the first thought came was that the Ballet is about love. So, I wrote this poem ! Hope your feelings of love is rekindled with this poem :)

Tuesday, October 30, 2012

Cloud Vs Moon

A dark night
Moon shine lit
Floating Cloud
Senses shed

A moment blinks
Moon sinks
Cloud hovers
And few showers

Cloud claded moon
Like love struck maroon
Fled too fast
Was it just overcast ?

Morning came, Little rain
Cloud vanished, Moon tarnished
Sky blue, night flew
Cloud gone, moon alone

Time to set, life at bet
One night to live, All to give
Out of reach, came to teach
Clouds are fast, they don last
Shower a few and then find new

Night again, moon shine
Sky clear and sliver line
Clouds are ephemeral, Short & temporal
Moon survives, Many lives
Here to stay every night
Shine as before with silvery light
A Cloud can't devastate
The moon's shining state





Shweta Singh












Tuesday, October 23, 2012

Painting

Enter a dream
Beautifull as "scream"
numerous colors
and several screens

Some are unknown
colors galore, strokes form
Trees, ships, water or pawn
silence, face or thunderstorm

mounted on wall
colors of fall
women in red
thoughts painted left unsaid

painted to sell
may be just to tell
what lies beneath
or is it a sheath ? 

love of name
awaiting fame ?
passion unsurpassed
leaving behind when everything's passed.

Ships on shore
Starry nights
Sometimes Darkness
some shooting stars

A maze of colors,
For pleasing minds.
love of creation
All this reminds

World is an art
If you have a heart
Light, dark, love and beauty's rife
To create all again, is a Painter's life !

Shweta Singh 
(Inspired By a Friend Who Paints)






Monday, October 22, 2012

कविता की कविता

एक कविता पढ़ रही थी
सोचा, कविता अगर कविता लिखती तो ?

तो ये कविता एक कविता की है
मुश्किल है, पर कविता क्या उड़ान नहीं भर सकती ?

-----------------------------------------
श्याही से बनाते हैं मुझे,
और पन्नों पर जीवन जमता !!
चन्द रोज सजाते हैं मुझे,
फिर बंद किवाड़ के पीछे रमना

कुछ देख मुझे मुस्कुराते,
और कुछ निगाहें टिकती भी नहीं !
कुछ रंगों से हैं सजाते,
कुछ उचाईयों तक पहूंचती नहीं !

एक और ख़ासियत है मुझमें
खुद का निर्माण महसूस होता है
अधूरी साँस भी चलती है मुझमें
और कभी जीवन अधूरा ही रहता है
साहित्य से निर्माण होकर भी अधूरा रहना ?
किसने सोचा होगा ?

पर अधूरे जीवन की कविता का मोल है
गुनगुनाती हूँ मैं मुक्त हो कर
मेरा अंत किसी और ने तय नहीं किया है
असमंजस का भाव होता है देख कर

जैसे प्रश्नो में ये प्रश्न हो
कहाँ जाओगी कविता रानी ?
और मैं भारी पलकें उठा कर
गगन को देख कर
इंद्रधनूषी रंग चुन लूँगी..
क्यूकी मैं अधूरी कविता हूँ !

हर पंक्ति के रास्ते गहरे समुंदर का पाठ है
किसी पंक्ति में जीवन उदय होता है
और किसी पंक्ति में संसार मोती
पर अधूरी कविता तो नृत्य की भाँति
हर मुद्रा से कुछ भी कह सकती है

अधूरा होना भी सुखमय होगा ?
ये तो बस मुझे  ही पता है
अपने निर्माणकार को खोना
फिर अपने पूरे होने की ख्वाइश
उस ख्वाइश में उड़ान
कभी चोटें तो कभी मुस्कान
पर कविता हूँ !
मैं ही हार गयी तो मुझे पढ़ने वाले कब जी पाएँगे ?
अधूरी हूँ, पर पूरी हूँ
बिखरी नहीं हूँ, कुछ शब्द गूथे हुवे हैं अब भी !

कोई कवि तो होगा, जो मेरे आकर का निर्माणकार  होगा !
अधूरी कविता हूँ और आँखें आसमान की ओर उजागर हैं !!
रंगों की श्याही का इंतेज़ार रहता है!
क्यूंकी कविता अधूरी हो कर भी जीती है !!
और मैं कविता, मेरा हर अंग जीवीत है !!

परंतु कोई कवि, निर्माणकार बन कर आता
तो मैं कविता, अधूरी सांसो में ना रहती !
कवियों, निवेदन है, किसी कविता को अधूरा ना रखना
श्याही का रंग कला हो, नीला हो, लाल हो
मेरी आँखों को गीला ना रखना !
जब भी कलम उठाना
जड़ से चेतन तक मेरी रचना करना
और साँस भर कर, किसी पन्ने पर गढ़ देना !

फिर भी, कविता हूँ, जीवन कैसा भी हो
अधूरा हो, समय के साथ सदा जीवित रहूंगी !


------------------------------------------------------------

सच है कविता का जीवन कविता ही प्रत्यक्ष कर सकती है !!


श्वेता सिंघ

Friday, October 12, 2012

पुरानी खिड़की

एक खिड़की कुछ सालों पहले बंद कर दी थी
कल अचानक से उसके चटकने की आवाज़ आई !
रंग ऊड गये थे, और मकड़ी के जाले भी थे
फिर भी उस खिड़की की दूसरी ओर से झिलमिल रंग छलके

किसी अवहेलना में तो किसी ज़िद्द में
मुड़ कर देखना उस चटकने पर मंजूर ना था
मजबूर हो गयी पर, और मुड़ कर देखा
ये वो खिड़की थी जिससे बड़े ज़तन से सजाया था

खिड़की के उस पार
बचपन था, किलकरियाँ तीन
सुनहरी शामें थीं, और सपने थे
दोस्ती थी, और जीवन भर के वादे थे

खिड़की के उस पार खड़े होंने पर
जीवन मृदंग जैसा था
सितार की तान सा मधुर
और सवान के मोर जैसा पुलकित

खिड़की के उस पार
मेहंदी की ख़ुश्बू थी
और खुली ज़ुल्फोन से बादल
झूले थे और आँखों में काजल

चंद तस्वीरे  थीं
और वो खाली रास्ते जो हंसते थे
चंद ऐसे लम्हे भी
जो वक़्त की नदी में जमे हैं

एक आवाज़ थी, और एक ख्वाइश
एक शिकायत भी, और एक गुज़ारिश
थोड़े आँसू जो अभी भी बह रहे थे
और कुछ पत्ते जो वहीं इंतेज़ार में थे

बहुत चाहा था की खिड़की के उस पार ना देखूं
पर जैसे ही वो एक आवाज़ आई
ना चाह कर भी पलट गयी
करीब से सुना तो
एक सिस्की की कोशिश थी
की मैं सुन लूँ शायद ?
कब तक अनसुना कर के रहती !

बेपरवाह हो कर आज मैने उस खिड़की को खोल दिया
जो सालों पहले, अपनी ही सिसकी के साथ दफ़ना दिया था
खिड़की के उस पार सब वैसा ही था
मेहंदी, काजल, खुली ज़ूलफें, खाली रास्ते, कुछ वादे
ठंडी पवन, जड़ों की धूंड, और दोस्तों की बातें
सब वैसा ही था.. देख कर हृदय फिर से जीने की ज़िद करने लगा !
पर अब वो सिसकी अट्टहास करती थी
इस मूक हृदय पर, या सूखी आँखों पर
जो दफ़ना दिया था, उसे खोलना ज़रूरी था क्या ?
इस एहसास को समझ ही ना पाना अछा था !
उस खिड़की के किनारे बड़ी कीलें लगा रखी थी
उन कीलों से खुद को चुबन होती थी
पर कहीं एक पत्थर पर लिखा था की
अपने आँसुओं की कसम, अब वापस नहीं आओंगी!
और उस एक कसम को पूरा करने में
हृदय को मूक और आखों को नीर रहित कर दिया !

सब कुछ खोने को ताईयार, एक कसम के कारण
सालों पहले एक सिसकी सहित उस खिड़की को बंद कर दिया था
आज क्यूँ उस खिड़की के पार देखती हूँ ?
आज क्यूँ खिड़की के उस पार की मेहंदी याद आती है ?
आज क्यूँ आँखें वापस से उन्ही आँसू को बहाती हैं ?
आक क्यूँ सालों पहले जैसे पत्थर नहीं हो जाती ?

नहीं जाना मुझे खिड़की के उस पार
नहीं देखना उस सुनहरी शाम को !
नहीं चाईए कोई मेहंदी की खूस्बू
अब नहीं चाईए कोई भी आँसू

फिर से पलटती हूँ, और उस सिसकी को अनसुना कर
और आँखों को पत्थर कर
हृदय को फिर से सुला कर
चटकते हुवी खिड़की में
एक और कील लगा कर
बंद कर दिया है मैने !

अब उस खिड़की में कोई दरार भी नहीं है !
किसी दरार से ना कोई खुसबू आएगी
और ना ही कोई रोशनी
ना दोस्ती, ना सिसकी
ना कोहरे की ठंडक, ना सूरज की तपिश
ना खाली रास्तों की किल्कारी
ना खुली ज़ुल्फोन के साए !

आज मैने उस खिड़की को दोबारा बंद कर दिया है
उसके ऊपर एक दीवार भी लगा दी है !
बस इतनी सी गुज़ारिश है
कोई इस खिड़की की याददस्त मिटा दे !

श्वेता सिंघ

Thursday, August 23, 2012

Paanch Saal

कुछ रिश्तों में दूरियाँ आ गयीं
और कुछ टूट ही गये !
पर ज़िंदगी ना रुकी कहीं
और ना सपने कहीं गये !!

फिर रिश्ता ज़िंदगी और सपनों से क्यूँ नहीं ? 

Shweta

Saturday, July 7, 2012

The Lost Brother

Faint memoirs of you
today came to me
How many years flew ?
Is it 10 or few ?

I didnt love you
neither I was close to you
You were 10 years older
and hardly spent time together

I knew you were a bad boy
I was told to keep away
I was also scared of you
and thought will never miss you

that day when i went home
i found your wife and son
that phone call which reported you missing
I remember it today, i didnt love you still
But, I remember one thing
my eyes went wet
and the last thing to bet
I remembered your smile
and all your badness missed for a while
your son is beautifull
and your wife still young
how she cooked and waited for you
and smiled with tears few

It's been 7 years
your son is now 6 year older
and your wife is now someone else
But, you are still my brother
the one that I never loved
but eyes go wet and I imagine

I imagine that you are alive
may be sitting in a temple
I imagine you singing
may be following your life
I hope if you are there
we meet once again ever
whereever you are
remember you are still my brother


Missing Ravi Bhaiya (my cousin) Today who has been missing for past 7 years. I hope one day he returns.




Wednesday, July 4, 2012

Poem By Allam Ikbal !

Time for guest poem on my Poem Blog. This one was recited by my Dad over the phone ! Miss you Dad and Love you a Lot.

tu saheen hai parvaaz hai kaam tera
tere saamney aasmaan aur bhi hain
issi rojo sab mein ulajh kar na reha jaa
ki tere jameen-O-makam aur bhi hain
sitaron se aagey jahan aur bhi hain !!

Thursday, June 28, 2012

एक और सफ़र

मिट्टी से खेलना कभी किसी ने नहीं सिखाया,
बस खुद से आ गया था |
मिट्टी को रौंध कर कभी सपना सजाया
तो कभी घर बनाया था |
मिट्टी को मिट्टी से निकाल कर उस में ही मिलाया
पर हाथों से जैसे सोना बनाया था|

जैसे बनते बिखरते थे
उसका नाम तो नहीं था बस बन गये
और जब खेल खतम होता
तो वहीँ छोड़ जाते थे
पर स्मृति के पन्नों में एक चित्र अंकित होता था|
हर दिन धूमिल हर दिन उतेज़ित
कभी दोपहर के सूरज सा हताश
तो कभी गॉधुलि बेला सा सज्जित

उस मिट्टी को भी अब छोड़ कर जाना था
जिस मिट्टी में काई बार सँवरे
और काई बार बिखरे
कुछ को नाम नहीं दिए
कुछ को नाम दे कर तोड़ दिया
कुछ अब भी सपने में संजोए हैं
ये बनते बिखरते मिट्टी से ताने  बाने
इसी मिट्टी से उभरे हैं और यहीं मिल जाएँगे
ये खेल भी ख़तम होता प्रतीत होता है
सुना है स्मृति भी धूमिल होती है
पर मैने आँसू से सीच कर
और प्रेम की गर्माहट से
इस मिट्टी के चिन्हों को पक्का कर दिया है

नाम नहीं होंगे
टूटे भी होंगे
शायद फिर कुछ यहीं से नये बनेंगे
पर कहीं ना कहीं इस बनने  बुनने के ताने बने
सफ़र में मील का पथर रहेंगे
और मेरे बाद इस पर और भी चित्र अंकित होंगे
हाँ ! मैने इस मिट्टी को पका दिया है !

Sunday, May 13, 2012

आँखें

आज मैने सीढ़ियों पर उल्टा उतरना सीखा
सोचती थी की भगवान ने दोनों आँखें चेहेरे के सामने ही क्यूँ दी है ?
एक आँख आगे और एक पीछे होती तो ?
तो दोनों आँखों का आकर भी बड़ा होता ?

उल्टा उतरने में मुश्किल तो नहीं हुवी
पर हां ! आँखें बंद कर के उतरना आसान था !
आँखें बंद करने पर ये विश्वास था
की अगर गिरी तो फिर खड़ी हो जाऊंगी
आँखें खोल कर शायद कदम फूँक फूँक कर रखती हूँ
और अगर ग़लती से ठोकर लग गयी
तो संभलने का साहस नहीं होता

तो क्या आँखें होती ही नहीं तो क्या होता ?
गिरती उठती, फिर गिरती फिर उठती
पर शायद हर वक़्त इस डर के साथ नहीं जीती की कदम सही पड़ने चाहिए !
क्या ये सच है ? सोचती हूँ किसी बिना आँखें वाले से पूचों
उसे ये सब अच्छा लगेगा क्या ?

और फिर वोही ख़याल
शायद दोनों आँखें चेहरे के सामने नहीं होती तो अच्छा होता !
पर आगे कुछ और दिखता , पिच्छे कुछ और
तो डरऔर  बढ़ जाता, क्यूंकी अब दोनों तरफ कदम फूँक के रखने पड़ते !

सोचती हूँ.. एक बार गिर कर देखती हूँ ! आख़िर पीछे तो आँखें है नहीं ना !