मिट्टी से खेलना कभी किसी ने नहीं सिखाया,
बस खुद से आ गया था |
मिट्टी को रौंध कर कभी सपना सजाया
तो कभी घर बनाया था |
मिट्टी को मिट्टी से निकाल कर उस में ही मिलाया
पर हाथों से जैसे सोना बनाया था|
जैसे बनते बिखरते थे
उसका नाम तो नहीं था बस बन गये
और जब खेल खतम होता
तो वहीँ छोड़ जाते थे
पर स्मृति के पन्नों में एक चित्र अंकित होता था|
हर दिन धूमिल हर दिन उतेज़ित
कभी दोपहर के सूरज सा हताश
तो कभी गॉधुलि बेला सा सज्जित
उस मिट्टी को भी अब छोड़ कर जाना था
जिस मिट्टी में काई बार सँवरे
और काई बार बिखरे
कुछ को नाम नहीं दिए
कुछ को नाम दे कर तोड़ दिया
कुछ अब भी सपने में संजोए हैं
ये बनते बिखरते मिट्टी से ताने बाने
इसी मिट्टी से उभरे हैं और यहीं मिल जाएँगे
ये खेल भी ख़तम होता प्रतीत होता है
सुना है स्मृति भी धूमिल होती है
पर मैने आँसू से सीच कर
और प्रेम की गर्माहट से
इस मिट्टी के चिन्हों को पक्का कर दिया है
नाम नहीं होंगे
टूटे भी होंगे
शायद फिर कुछ यहीं से नये बनेंगे
पर कहीं ना कहीं इस बनने बुनने के ताने बने
सफ़र में मील का पथर रहेंगे
और मेरे बाद इस पर और भी चित्र अंकित होंगे
हाँ ! मैने इस मिट्टी को पका दिया है !
बस खुद से आ गया था |
मिट्टी को रौंध कर कभी सपना सजाया
तो कभी घर बनाया था |
मिट्टी को मिट्टी से निकाल कर उस में ही मिलाया
पर हाथों से जैसे सोना बनाया था|
जैसे बनते बिखरते थे
उसका नाम तो नहीं था बस बन गये
और जब खेल खतम होता
तो वहीँ छोड़ जाते थे
पर स्मृति के पन्नों में एक चित्र अंकित होता था|
हर दिन धूमिल हर दिन उतेज़ित
कभी दोपहर के सूरज सा हताश
तो कभी गॉधुलि बेला सा सज्जित
उस मिट्टी को भी अब छोड़ कर जाना था
जिस मिट्टी में काई बार सँवरे
और काई बार बिखरे
कुछ को नाम नहीं दिए
कुछ को नाम दे कर तोड़ दिया
कुछ अब भी सपने में संजोए हैं
ये बनते बिखरते मिट्टी से ताने बाने
इसी मिट्टी से उभरे हैं और यहीं मिल जाएँगे
ये खेल भी ख़तम होता प्रतीत होता है
सुना है स्मृति भी धूमिल होती है
पर मैने आँसू से सीच कर
और प्रेम की गर्माहट से
इस मिट्टी के चिन्हों को पक्का कर दिया है
नाम नहीं होंगे
टूटे भी होंगे
शायद फिर कुछ यहीं से नये बनेंगे
पर कहीं ना कहीं इस बनने बुनने के ताने बने
सफ़र में मील का पथर रहेंगे
और मेरे बाद इस पर और भी चित्र अंकित होंगे
हाँ ! मैने इस मिट्टी को पका दिया है !