Monday, October 22, 2012

कविता की कविता

एक कविता पढ़ रही थी
सोचा, कविता अगर कविता लिखती तो ?

तो ये कविता एक कविता की है
मुश्किल है, पर कविता क्या उड़ान नहीं भर सकती ?

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श्याही से बनाते हैं मुझे,
और पन्नों पर जीवन जमता !!
चन्द रोज सजाते हैं मुझे,
फिर बंद किवाड़ के पीछे रमना

कुछ देख मुझे मुस्कुराते,
और कुछ निगाहें टिकती भी नहीं !
कुछ रंगों से हैं सजाते,
कुछ उचाईयों तक पहूंचती नहीं !

एक और ख़ासियत है मुझमें
खुद का निर्माण महसूस होता है
अधूरी साँस भी चलती है मुझमें
और कभी जीवन अधूरा ही रहता है
साहित्य से निर्माण होकर भी अधूरा रहना ?
किसने सोचा होगा ?

पर अधूरे जीवन की कविता का मोल है
गुनगुनाती हूँ मैं मुक्त हो कर
मेरा अंत किसी और ने तय नहीं किया है
असमंजस का भाव होता है देख कर

जैसे प्रश्नो में ये प्रश्न हो
कहाँ जाओगी कविता रानी ?
और मैं भारी पलकें उठा कर
गगन को देख कर
इंद्रधनूषी रंग चुन लूँगी..
क्यूकी मैं अधूरी कविता हूँ !

हर पंक्ति के रास्ते गहरे समुंदर का पाठ है
किसी पंक्ति में जीवन उदय होता है
और किसी पंक्ति में संसार मोती
पर अधूरी कविता तो नृत्य की भाँति
हर मुद्रा से कुछ भी कह सकती है

अधूरा होना भी सुखमय होगा ?
ये तो बस मुझे  ही पता है
अपने निर्माणकार को खोना
फिर अपने पूरे होने की ख्वाइश
उस ख्वाइश में उड़ान
कभी चोटें तो कभी मुस्कान
पर कविता हूँ !
मैं ही हार गयी तो मुझे पढ़ने वाले कब जी पाएँगे ?
अधूरी हूँ, पर पूरी हूँ
बिखरी नहीं हूँ, कुछ शब्द गूथे हुवे हैं अब भी !

कोई कवि तो होगा, जो मेरे आकर का निर्माणकार  होगा !
अधूरी कविता हूँ और आँखें आसमान की ओर उजागर हैं !!
रंगों की श्याही का इंतेज़ार रहता है!
क्यूंकी कविता अधूरी हो कर भी जीती है !!
और मैं कविता, मेरा हर अंग जीवीत है !!

परंतु कोई कवि, निर्माणकार बन कर आता
तो मैं कविता, अधूरी सांसो में ना रहती !
कवियों, निवेदन है, किसी कविता को अधूरा ना रखना
श्याही का रंग कला हो, नीला हो, लाल हो
मेरी आँखों को गीला ना रखना !
जब भी कलम उठाना
जड़ से चेतन तक मेरी रचना करना
और साँस भर कर, किसी पन्ने पर गढ़ देना !

फिर भी, कविता हूँ, जीवन कैसा भी हो
अधूरा हो, समय के साथ सदा जीवित रहूंगी !


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सच है कविता का जीवन कविता ही प्रत्यक्ष कर सकती है !!


श्वेता सिंघ

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