Friday, October 12, 2012

पुरानी खिड़की

एक खिड़की कुछ सालों पहले बंद कर दी थी
कल अचानक से उसके चटकने की आवाज़ आई !
रंग ऊड गये थे, और मकड़ी के जाले भी थे
फिर भी उस खिड़की की दूसरी ओर से झिलमिल रंग छलके

किसी अवहेलना में तो किसी ज़िद्द में
मुड़ कर देखना उस चटकने पर मंजूर ना था
मजबूर हो गयी पर, और मुड़ कर देखा
ये वो खिड़की थी जिससे बड़े ज़तन से सजाया था

खिड़की के उस पार
बचपन था, किलकरियाँ तीन
सुनहरी शामें थीं, और सपने थे
दोस्ती थी, और जीवन भर के वादे थे

खिड़की के उस पार खड़े होंने पर
जीवन मृदंग जैसा था
सितार की तान सा मधुर
और सवान के मोर जैसा पुलकित

खिड़की के उस पार
मेहंदी की ख़ुश्बू थी
और खुली ज़ुल्फोन से बादल
झूले थे और आँखों में काजल

चंद तस्वीरे  थीं
और वो खाली रास्ते जो हंसते थे
चंद ऐसे लम्हे भी
जो वक़्त की नदी में जमे हैं

एक आवाज़ थी, और एक ख्वाइश
एक शिकायत भी, और एक गुज़ारिश
थोड़े आँसू जो अभी भी बह रहे थे
और कुछ पत्ते जो वहीं इंतेज़ार में थे

बहुत चाहा था की खिड़की के उस पार ना देखूं
पर जैसे ही वो एक आवाज़ आई
ना चाह कर भी पलट गयी
करीब से सुना तो
एक सिस्की की कोशिश थी
की मैं सुन लूँ शायद ?
कब तक अनसुना कर के रहती !

बेपरवाह हो कर आज मैने उस खिड़की को खोल दिया
जो सालों पहले, अपनी ही सिसकी के साथ दफ़ना दिया था
खिड़की के उस पार सब वैसा ही था
मेहंदी, काजल, खुली ज़ूलफें, खाली रास्ते, कुछ वादे
ठंडी पवन, जड़ों की धूंड, और दोस्तों की बातें
सब वैसा ही था.. देख कर हृदय फिर से जीने की ज़िद करने लगा !
पर अब वो सिसकी अट्टहास करती थी
इस मूक हृदय पर, या सूखी आँखों पर
जो दफ़ना दिया था, उसे खोलना ज़रूरी था क्या ?
इस एहसास को समझ ही ना पाना अछा था !
उस खिड़की के किनारे बड़ी कीलें लगा रखी थी
उन कीलों से खुद को चुबन होती थी
पर कहीं एक पत्थर पर लिखा था की
अपने आँसुओं की कसम, अब वापस नहीं आओंगी!
और उस एक कसम को पूरा करने में
हृदय को मूक और आखों को नीर रहित कर दिया !

सब कुछ खोने को ताईयार, एक कसम के कारण
सालों पहले एक सिसकी सहित उस खिड़की को बंद कर दिया था
आज क्यूँ उस खिड़की के पार देखती हूँ ?
आज क्यूँ खिड़की के उस पार की मेहंदी याद आती है ?
आज क्यूँ आँखें वापस से उन्ही आँसू को बहाती हैं ?
आक क्यूँ सालों पहले जैसे पत्थर नहीं हो जाती ?

नहीं जाना मुझे खिड़की के उस पार
नहीं देखना उस सुनहरी शाम को !
नहीं चाईए कोई मेहंदी की खूस्बू
अब नहीं चाईए कोई भी आँसू

फिर से पलटती हूँ, और उस सिसकी को अनसुना कर
और आँखों को पत्थर कर
हृदय को फिर से सुला कर
चटकते हुवी खिड़की में
एक और कील लगा कर
बंद कर दिया है मैने !

अब उस खिड़की में कोई दरार भी नहीं है !
किसी दरार से ना कोई खुसबू आएगी
और ना ही कोई रोशनी
ना दोस्ती, ना सिसकी
ना कोहरे की ठंडक, ना सूरज की तपिश
ना खाली रास्तों की किल्कारी
ना खुली ज़ुल्फोन के साए !

आज मैने उस खिड़की को दोबारा बंद कर दिया है
उसके ऊपर एक दीवार भी लगा दी है !
बस इतनी सी गुज़ारिश है
कोई इस खिड़की की याददस्त मिटा दे !

श्वेता सिंघ

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