घर दरबार छोड़ आए हम,
पर्व त्योहार भी हो गये गुम
किन स्वपनों में जाग रहे हैं
नींद सुकून की गयी जहन्नुम
कोलाहाल सा मचा है,
खाली से इन भवनों में
शुन्य की आँधी, लहर रही है
थर थर अधरोन के स्वरों से
किर्किट की कुछ आवाज़ें
गीत सुनाती उठती हैं
चीख चीख कर, थक हर कर
सन्न्नतों में सिमटी हैं
आधा चंद्रमा भी , झाँक रहा है
दोहरी से खड़ा , असमंजस में,
आने का कोई कारण ना है
अमावस्या के आँगन में
खड़ा खड़ा जब थक जाता है
सनाटों के चौखट पर
चंदा भी फिर, सो जाता है
कुण्डी पकड़े, रैन बिता कर
धीरे धीरे फिर, तीव्र सवेरा
धो देता है आँगन को
मरे हुवे किर्किट फेक कर,
चल देते, उठा स्वपनों को
कोल्हाल शांत हुवा फिर,
आधारों पर है मुस्कानें
घर बार की सुध भी नहीं है,
नींद अभी भी है जहन्नुम
- श्वेता सिंघ
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