Sunday, February 1, 2026

बेटी का घर

 


बेटियों के घर नहीं होते  
 
घर होते हैं 
ईटों के  
बोझ के  
जब बेटी पैदा  
होती हैं  
 
घर होते हैं  
उस बेटे के  
जिसे लड़की पैदा करेगी 
और के लिए  
 
उसका खुद का कोना 
भी नहीं होता  
वो ढूनडटी है घर  
जहाँ सुकून से खुद की  
जगह बनाए  
जहाँ वो  
बेटी और बहू से परे  
इंसान हो  
अपनी इक्चाओ के साथ 
जहाँ भाभी के घर जाने  
की अनुभूति ना हो  
ना इजाज़त लेनी हो  
 
जहाँ लड़का पैदा करने  
से उसका वजूद ना हो  
पुत्रवती होने से पहले  
खुश रहने का आशीर्वाद मिले  
 
और जहाँ उसकी आवाज़  
उसका गुरु नहीं 
अधिकार हो  
 
बेटियों को घर बनाना चाहिए 
 
एक खुद का  
सुकून का, अधिकार का  
जहाँ वो बेटी, बहन, ननद या बहू ना हो 
बस एक इंसान हो  
 
श्वेता सिंघ  
फेब्रुवरी , २०२६ 
 

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