Wednesday, August 17, 2011

पुकार

एक समय की बात है मूल्यों का चुनाव करते थे
अब किसके मुल्य कहाँ धरे
मानवता शय्या पर पड़ी !

मूल्यों को तो पारिभाषा दी
आज की मानव जाती ने
"मैं", "मेरा" और मेरी खुशी
यही है धर्म मेरा !


सत्य निस्चित ही कड़वा है
पर सत्य का अब भी मोल है
और उस मोल को चुकाने
सत्यवीर का लहू ही बहता है

कहना ही होगा प्रभु
की बाड़ तो सबको खाने है
अर्जुन का लहू भी था बहा
एक दुर्योधन के बहाने  !

एक द्रौपदी के कारण हुवा महायुद्ध था
आज हाज़ारों द्रौपदियान रहती है खामोश यहाँ
किधर हो हे मधुसूधन, अब कुछ की पुकार सुनो
भाग्य बनाने वाले सबका, खुद के कर्मों को याद करो !

विश्वास अभी भी नहीं है टूटा
की आओगे हे भगवान
चुप रेह कर जो बीत गयी
भुला नहीं है उसको मॅन !


क्षमा भी रोती हुवि किसी कोने में है पड़ी
अब क्षमा को भी चाईए एक न्याय की कड़ी !
अब क्षमा भी तुझसे माँग रही अपमनों का बदला
क्षमा के भाग्य ने दी कर्मों की आहुति

काहे चुप हो खड़े ?
काहे ना आते पुकार पर
क्या तेरी किताब में लिखे भाग्यों पर
तेरा भी अधिकार नहीं ?

अब मेरी सुन हे कृष्णा
न्याय तुझे देना होगा
लाखों अश्रु धारा का
बोझ तुझे लेना होगा !

श्रीष्टी का विस्तार कर
तू कहीं छुपा क्यू बैठा है ?
क्यू खेल रहा हृदयों से
क्या यही तेरी नैतिकता है ?

हर रोज मॅन में विश्वास ये
मुझे जगाया जाता है
कर्मों का सबको फल मिलता
यही बताया जाता है !!

हर रोज लाखों तेरी धुरी पर सीष झुकाते हैं !
मायूस हो कर भाग्य से
कर्म भी धूँडने जाते हैं !

कुछ कहते हैं की !
फल है ये पिछले कर्मों का
क्यू प्रभु तू उनकों पिछले कर्म की
याददस्त भी नहीं देता है !


हे प्रभु कहाँ है तेरा वो विधान यहाँ
कर्म प्रधानता ध्वंस हुवि
सब हैं भाग्य प्रधान यहाँ !

ये कैसी लीला प्रभु ?
कुछ भोग रहे अंजाने दुखों को
विश्वास कैसे रहेगा फिर !
कर्मों की प्रधानता पर !!

अब गंगा का बहना निस्चित है
पर उससे भी पूछो हे प्रभु !
उसका मॅन भी धूमिल है
और मुक्ति उसे भी दो प्रभु !!


भागीरथ को भी जगाओ, उससे भी ये दिखलाओ
उसके कर्मों का फल अब गंगा भुगत रही !
कहाँ हैं तेरा न्यय प्रभु
कहाँ तेरी चतुराई
गंगा भी ना जाने किस भाग्य से धरती पर आई !!

हे कृष्णा कहाँ हो छुपे हुवे
अब तो अवतरित हो तुम
भूल गये क्या कर्मों को
हे मानव ! ऑवुगा तेरी पुकार पर ?

श्वेता सिंघ
















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